हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानी और सय्यद-ए-मुक़ावमत शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह तथा अन्य शहीदों की याद में मस्जिद पंजतनी, तारागढ़ में एक मजलिस-ए-अज़ा आयोजित की गई।
तारागढ़ के इमामे जुमा हुज्जतुल-इस्लाम मौलाना सय्यद नक़ी महदी ज़ैदी ने ‘इल्म व उलमा तथा नेतृत्व व मरजइयत’ के विषय पर संबोधित करते हुए कहा कि मरजे-ए-आला हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा शुबैरी ज़ंजानी ने अपना पूरा जीवन इल्म व फ़िक़ाह, मआरिफ़-ए-अहलेबैत (अ.) के प्रचार-प्रसार, छात्रों व विद्वानों के प्रशिक्षण और दीन की सेवा में बिताया।
उन्होंने आगे कहा कि आयतुल्लाह शुबैरी ज़ंजानी की इल्मी शख्सियत, तक़वा, ज़ोहोद और नैतिक महानता हौज़ा-ए-इल्मिया की इल्मी और रूहानी परंपरा का एक रोशन अध्याय थी। उन्होंने लंबे समय तक क़ुम में हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.) के रौज़ा-ए-मुतह्हर में इमामे जमाअत के रूप में अपनी सेवाएं दीं और ज़ायरीन तथा मोमिनीन की दीनी और रूहानी रहनुमाई की।
मजलिस के ख़तीब हुज्जतुल-इस्लाम मौलाना नक़ी मेहदी ज़ैदी ने आगे कहा कि आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद शुबैरी ज़ंजानी ने अपनी पूरी उम्र फ़िक़्ह व उसूल, हदीस व रेजाल, शिक्षा व प्रशिक्षण तथा क़ुरआन व इत्रत (अ.) के मआरिफ़ के प्रचार-प्रसार में बिताई। उनकी इल्मी सेवाएं और उनके प्रशिक्षित शागिर्दों की बड़ी संख्या हौज़ा-ए-इल्मिया में एक स्थायी इल्मी विरासत की हैसियत रखती है।
उन्होंने कहा कि आयतुल्लाहिल उज़्मा हाज सय्यद मूसा शुबैरी ज़ंजानी की वफ़ात हौज़ा-ए-इल्मिया, आलम-ए-तशय्यु और पूरे इस्लामी इल्मी व दीनी समुदाय के लिए एक बड़ी त्रासदी है।
हुज्जतुल-इस्लाम मौलाना नक़ी महदी ज़ैदी ने सय्यद-ए-मुक़ावमत शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह की दूसरी बरसी का उल्लेख करते हुए कहा कि शहीद सय्यद हसन नसरुल्लाह केवल एक राजनीतिक या सैन्य नेता नहीं थे, बल्कि वर्तमान दौर में इस्लामी सम्मान और गौरव की व्यावहारिक तस्वीर थे। सय्यद हसन नसरुल्लाह की शहादत के बावजूद उनका रास्ता समाप्त नहीं हुआ, बल्कि जारी रहेगा, क्योंकि यह एक ऐसे पवित्र वृक्ष का फल है जिसे न जड़ से उखाड़ा जा सकता है और न ही उसके प्रभावों को मिटाया जा सकता है।
उन्होंने आगे कहा कि क्रांतिकारी शख्सियतों की प्रमुख विशेषताओं में से एक शहादत का गहरा जज़्बा है और यह महान विशेषता मज़लूम शहीद सय्यद नसरुल्लाह में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। उन्होंने कहा कि लेबनान की राजधानी बेरूत के दाहिया क्षेत्र में एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने बड़े उत्साह और साहस के साथ कहा था:
“मैं शहीद होकर मरना चाहता हूँ, ग़द्दार बनकर नहीं।”
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